हो परख तब मैत्री कहाॅं ?
क्यों मित्रता की परख हो ?
क्यों पुरुष बाहर परख से?
नर-नारि मेंं क्यों फरक हो ??
यह मित्रता तो फरेेब है ,
धोखाधड़ी की पोटली ।
करते चयन से मित्रता ,
यह बात कितनी खोखली ?
मनमाफिक को मित्र बनाले ,
नापसन्द को दूर हटा ।
सुन्दर कपड़े धारण कर लेंं ,
दूर हटा दें कटा - फटा ।।
पूर्ण स्वार्थमय संसार मे ,
सभी मित्र रिपु कोई नहीं।
जीव - जन्तु सभी जड़ जंगम ,
व्योम वायु जल अ्ग्नि मही ।।
सद्विचार कुविचार मित्र अरि ,
अन्दर सबके बैैठे हैं ।
लोक आचरण अपने देखें ,
सबके संग हम कैसे हैं ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
क्यों मित्रता की परख हो ?
क्यों पुरुष बाहर परख से?
नर-नारि मेंं क्यों फरक हो ??
यह मित्रता तो फरेेब है ,
धोखाधड़ी की पोटली ।
करते चयन से मित्रता ,
यह बात कितनी खोखली ?
मनमाफिक को मित्र बनाले ,
नापसन्द को दूर हटा ।
सुन्दर कपड़े धारण कर लेंं ,
दूर हटा दें कटा - फटा ।।
पूर्ण स्वार्थमय संसार मे ,
सभी मित्र रिपु कोई नहीं।
जीव - जन्तु सभी जड़ जंगम ,
व्योम वायु जल अ्ग्नि मही ।।
सद्विचार कुविचार मित्र अरि ,
अन्दर सबके बैैठे हैं ।
लोक आचरण अपने देखें ,
सबके संग हम कैसे हैं ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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