रविवार, 31 जनवरी 2016

हिन्दी के प्रथम वैज्ञानिक वैयाकरण आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के प्रति ---


श्रद्धाा - सुमन 

जीवन के अन्तिम साॅंसों तक ,
वे साज - सॅंवार में लगे रहे ।
विटपों में करके काट - छाॅंट ,
सह काॅंटे रम्य बनाते रहे ।।
फेंकी उखााड़ सब झंझ - झाड़ ,
मन्दिर प्रांगण को कर सॅॅंवार ।
नव किसलय फूटे पुहुप नये ,
विकसित उपवन आई बहार ।।
संस्कृत - अंग्रेजी मिश्रधातुु ,
थी आकर्षक पर नहीं छटा ।
हिन्दी-माॅं प्रतिमा साफ किया ,
स्वर्णायित करके मिश्र हटा ।।
भक्तों ने सफाई देखी तो ,
प्राचीन मोह संवरण नहीं ,
था सांकर्य से स्नेह जिन्हें ,
स्वर्णाभा की पहचान नहीं ।।
उलटी -सीधी कोई कहता ,
बहुतों ने किया प्रशंसा ही ।
प्रतिमा से प्रस्फुटित कान्ति देख,
निज दिव्य द्युति माने सबही ।।
आचार्य तो कहते कुछ न किया ,
मन्दिर सौन्दर्य में क्या न दिया ?
बनकर प्रदीप प्रज्ज्वलित रहा ,
आखिर सर्वस्व लुटा ही दिया ।।
आएगा ऐसा भी कोई ,
वैज्ञानिकता दिखलाएगा ।
जगमग कर देगा मन्दिर को ,
तेरा अभाव नहीं जाएगा ।।
पूजूॅंं कैसे मैं तुम्हें देेव ,
तपकर आलोक विखेरगए ।
मुझ अनजाने को ढंग नहीं ,
हैं भाव किन्तु दर्शन न हुए ।।
जाने- अनजाने पुष्प जुटा ,
कुछ शब्द -सुमन से भरा थाली ।
अवलोकन पूज्य सामग्री का ,
हैै दिव्य मूर्ति थााली खाली ।।
हेे शब्दशिल्प के ज्ञानी तुम !
हे आाशुतोष ! यह वर दे दो ।
बिन हिन्दी-पदवी दास हूॅॅं मैं ,
बलहीन बाहु , कुछ बल दे दो ।।
( मेरे प्रथम खण्डकाव्य " किशोरी अभिनन्दिनी " से )
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

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