रविवार, 31 जनवरी 2016

दफा 109

दुष्प्रेरण के अर्थ मे , यौन प्रेरणा लाय ।
कारण को परिणाम के , संगत माना जाय ।।
अपराधी की भाॅंति ही , प्रेरक को भी दण्ड ।
उभय पक्ष की हरकतें , तब ही होंगी ठण्ड ।।
लालच में सहमति बनी , पर जब दोहन बन्द ।
दोहक ही वादी बनें , सहानुभूति के छन्द ।।
सामाजिक स्थल बने , चूम - चाट के केन्द्र ।
दुष्प्रेरक यह कार्य है , साम्राज्य कामेन्द्र ।।
प्रेयसि प्रियतम -सा दिखे ,आपस में व्यवहार ।
कालेजों बाजार में , प्रेम का चढ़ा बुखार ।।
मुट्ठीभर ही लोग हैं , हाट चाट शौकीन ।
भारतीय अन्दाज को वे माने तौहीन ।।
आक्सीजन है प्रेरणा , ईंधन कामी लोग ।
कामाग्नि बूझे नहीं , विलग करो संयोग ।।
कानूनन नहीं नग्नता , है एक उचित विचार ।
पर संसर्ग भी स्वेच्छया , है एक महाविकार ।।
गर्भपात नहिं उचित है , क्वांरी माॅं ना ठीक ।
उच्छृंखल सहवास में , सहमति भी ना ठीक ।।
जनता के प्रतिनिधि सभी , जन से करें विचार ।
रहन - सहन ना उचित तो ,मिटे न यौन विकार ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

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