नीति परक दोहे
नीम न मीठी हो कभी ,गुड़ - घी सींचे लोक ।
मधु भी तीता ना लगे , तब क्यों भारी शोक ??
कुत्तों का दुम बदलना स्वयं में टेढ़ी बात ।
मनमाने की शोच से दिन न बनेगा रात ।।
आप भला तो जग भला , भीतर अपने देख ।
अन्दर ही सब रंग हैं , जैसा भर आरेख ।।
अलंकार क्या रूप को । शस्त्र से सजे न वीर ।
अति आचरण न शोभता , अविवेक ना धीर ।।
भूषण उत्म शील है , कृत्य सभी शुभ कर्म ।
समझदार संकेत का , ठीक समझते मर्म ।।
वही भूमि उर्वरक जल, बीज मात्र है मूल ।
मीठे -तीते फल मिलें , पुष्प कहीं ,कहिं शूल ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
नीम न मीठी हो कभी ,गुड़ - घी सींचे लोक ।
मधु भी तीता ना लगे , तब क्यों भारी शोक ??
कुत्तों का दुम बदलना स्वयं में टेढ़ी बात ।
मनमाने की शोच से दिन न बनेगा रात ।।
आप भला तो जग भला , भीतर अपने देख ।
अन्दर ही सब रंग हैं , जैसा भर आरेख ।।
अलंकार क्या रूप को । शस्त्र से सजे न वीर ।
अति आचरण न शोभता , अविवेक ना धीर ।।
भूषण उत्म शील है , कृत्य सभी शुभ कर्म ।
समझदार संकेत का , ठीक समझते मर्म ।।
वही भूमि उर्वरक जल, बीज मात्र है मूल ।
मीठे -तीते फल मिलें , पुष्प कहीं ,कहिं शूल ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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