रविवार, 31 जनवरी 2016

शादी का ढंग तो आर्ष रहा 
 
उन्नीस सौ उन्नीस में ,शास्त्री सोलन में अध्यापक ।
शादी की बात हुई पक्की , उल्लसित सरस्वती आराधक ।।
किशोरी पहुॅंचे कानपुर , चाचा के चरण छुए जाकर ।
चाचा -चाी का स्नेह अतुल , मौसी भाभी को पुलकित कर ।।
मनचाहा रिश्ता न पाकर, चाचाजी क्षणभर हुए रूष्ट ।
थी ललक बहू को पाने की , चाचा - मौसी तो महातुष्ट ।।
शादी का ढंग तो आर्ष रहा , था पढ़ा पाठ मितव्ययिता का ।
अर्जित भी हुआ अनुशंस महा , नहिं बोझ बना कन्या पितु का ।।
ना नाई ना बाजा हाथी , वे अदद चार थे बाराती ।
जंजीर पहनकर मॅंगनी की , पहिचान रही पीली धोती ।।
मुछं शादी थीं दुलहे की , कांग्रेसा कुरता खद्दर का ।
शौकीनी थी या मजबूरी , पर समारोह राष्ट्रीयता - सा ।।
श्री किशोरी दास तब , दास दुलारी के बने ।
गार्हस्थ जीवन के स्वयं कर्णधार थे ।
माताथीं न पिता थे न भाई बहन खेत बैल ।
व्याकण प्रणेता वह , शारदा के दास थे ।।
किशोरीदास नाम से , थे विद्यादास काम से ।
दुलारी दास धाम के , थे क्रोधी परशुराम - से ।।
( दुलारी = आचार्य श्री किशोरी दास वाजपेयी की पत्नी का नाम )
मेरे द्वारा रचित खण्डकाव्य : किशोरी अभिनन्दिनी से उध्दृत यह रचना है ।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

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