मन मेें शिव ध्यान हो
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ठंंड विभावरी , शीत प्रदेश में ,
चाॅंद चटक चाॅंदनी छिटकाई ।
देवनदी -तट, शाान्त वनांंचल ,
शान्तमना , सुख आसन पाई ।
आॅंख भरी ,मन मेें शिवध्यान हो ,
दुर्लभ योग दशा कब आई ?
भोग से मोह छुटे ही नहींं ,
अब अन्त समय तो निकट चलि आई ।।
( मेरी कृति " भर्तृहरि शतक " के हिन्दी काव्यानुवाद " शतक त्रयी से )
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
नुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे ।।
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ठंंड विभावरी , शीत प्रदेश में ,
चाॅंद चटक चाॅंदनी छिटकाई ।
देवनदी -तट, शाान्त वनांंचल ,
शान्तमना , सुख आसन पाई ।
आॅंख भरी ,मन मेें शिवध्यान हो ,
दुर्लभ योग दशा कब आई ?
भोग से मोह छुटे ही नहींं ,
अब अन्त समय तो निकट चलि आई ।।
( मेरी कृति " भर्तृहरि शतक " के हिन्दी काव्यानुवाद " शतक त्रयी से )
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
नुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे ।।
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