बन्दिशें
बन्दिशें बेकार सब , बेेफििक्र हों जब शर्म से ।
बेतजुर्बी हिकमतें लाचारगी के खयाल से ।।
जज्बात में मंजूर सब , पर हकीकत शिफर है ।
हैं बेखबर हर चीज से , बकवास से वे बाखबर ।।
मतलबी खुदगर्ज रहते , मदद में हैं वे लगे ।
तेल दीये की चुराकर रोशनी वे कर रहे ।।
कंगाल थे कुुछ साल पहले ,अब खजाना भर गया ।
चने को मोहताज थे वे , आज काजूू खा रहे ।।
पूछो सबब उनसे जरा , कि महल कैसे बन रहा ?
कीमती सामान अल्लादीन के ही चिराग से ।।
शर्मगी से दूर हैं , पानी बना सब खून हैै ।
रंग रोशन से ही उनके , चेेहरे का नूूर है ।।
----कवि सर्वानन्दद पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नििययंत्रक , पूर्वोत्तर रेललवेे , वाराणसी ।
बन्दिशें बेकार सब , बेेफििक्र हों जब शर्म से ।
बेतजुर्बी हिकमतें लाचारगी के खयाल से ।।
जज्बात में मंजूर सब , पर हकीकत शिफर है ।
हैं बेखबर हर चीज से , बकवास से वे बाखबर ।।
मतलबी खुदगर्ज रहते , मदद में हैं वे लगे ।
तेल दीये की चुराकर रोशनी वे कर रहे ।।
कंगाल थे कुुछ साल पहले ,अब खजाना भर गया ।
चने को मोहताज थे वे , आज काजूू खा रहे ।।
पूछो सबब उनसे जरा , कि महल कैसे बन रहा ?
कीमती सामान अल्लादीन के ही चिराग से ।।
शर्मगी से दूर हैं , पानी बना सब खून हैै ।
रंग रोशन से ही उनके , चेेहरे का नूूर है ।।
----कवि सर्वानन्दद पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नििययंत्रक , पूर्वोत्तर रेललवेे , वाराणसी ।
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