श्रीकृष्ण जन्म
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जन्मकाल में बन्दीगृह के ,
फाटक सब खुल जाते हैं ।
दंवारपाल सब बेसुध होकर
जहाॅं - तहाॅं सो जाते हैं ।।
कालगाल में लाल न जाए ,
मात - पिता घबराते हैं ।
पत्थर रखकर निज छाती पर ,
त्याग की युक्ति लगाते हैं ।।
सूप में रखकर जिगर का टुकडा ,
तुरत ही दूर हटाते हैं ।
नन्द यशोदा की कन्या ला ,
कंस दलन को बचाते हैं ।।
यमुना बढ़ीं पाॅंव छूने को ,
देख पिता घबराते हैं ।
छन मे घुटने तक जल पाकर ,
मन ही मन चकराते हैं ।।
देवकी बसुदेव के नन्दन ,
बासुदेव कहलाते हैं ।
माॅं जसुमति और नन्द दुलारे ,
सबका मन हरषाते हैं ।।
ग्वाल बाल संग मटका फोड़ें ,
नित नवनीत चुराते हैं ।
रंगे हाथ जब पकड़े जाते ,
कान पकड़ घिघियाते हैं ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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जन्मकाल में बन्दीगृह के ,
फाटक सब खुल जाते हैं ।
दंवारपाल सब बेसुध होकर
जहाॅं - तहाॅं सो जाते हैं ।।
कालगाल में लाल न जाए ,
मात - पिता घबराते हैं ।
पत्थर रखकर निज छाती पर ,
त्याग की युक्ति लगाते हैं ।।
सूप में रखकर जिगर का टुकडा ,
तुरत ही दूर हटाते हैं ।
नन्द यशोदा की कन्या ला ,
कंस दलन को बचाते हैं ।।
यमुना बढ़ीं पाॅंव छूने को ,
देख पिता घबराते हैं ।
छन मे घुटने तक जल पाकर ,
मन ही मन चकराते हैं ।।
देवकी बसुदेव के नन्दन ,
बासुदेव कहलाते हैं ।
माॅं जसुमति और नन्द दुलारे ,
सबका मन हरषाते हैं ।।
ग्वाल बाल संग मटका फोड़ें ,
नित नवनीत चुराते हैं ।
रंगे हाथ जब पकड़े जाते ,
कान पकड़ घिघियाते हैं ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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