असीम शान्ति - सुख
न कल नकल किया , न आज कर रहा ,
नगर - नगर चला , डगर नहीं मिला ।
नजर पथर गया , दृग खुला रहा ।
नवल - धवल मुझे , कोई नहीं मिला ।।
मनुष्यता सदा छलक - छलक रहा ,
बढ़ाया हाथ ,पर अत्यल्प हीं मिला ।
कल्पना का सच , मैं खोजता फिरा ,
खराब खोजते , स्वयं से ही मिला ।।
चमक - धमक कभी , पसन्द ना रहा ,
किसी से ना कोई , किया कभी गिला ।
खनक - हनक से मैं , दूर ही रहा ,
असीम शान्ति सुख , पर मुझे मिला ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
नगर - नगर चला , डगर नहीं मिला ।
नजर पथर गया , दृग खुला रहा ।
नवल - धवल मुझे , कोई नहीं मिला ।।
मनुष्यता सदा छलक - छलक रहा ,
बढ़ाया हाथ ,पर अत्यल्प हीं मिला ।
कल्पना का सच , मैं खोजता फिरा ,
खराब खोजते , स्वयं से ही मिला ।।
चमक - धमक कभी , पसन्द ना रहा ,
किसी से ना कोई , किया कभी गिला ।
खनक - हनक से मैं , दूर ही रहा ,
असीम शान्ति सुख , पर मुझे मिला ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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