मेरी रावणी वृत्ति , इसे बढ़ावा देनेे वालों को सग्लानि समर्पित -----
नग्न बदन लगता अति सुन्दर ,
चित्र उकेरे गजब पुरन्दर।
चोरदृष्टि से , बच नजरों से ,
रति अनंग हिये पाता हूॅं
रूप सरस पीए जाता हूूॅं ।।
चित्र उकेरे गजब पुरन्दर।
चोरदृष्टि से , बच नजरों से ,
रति अनंग हिये पाता हूॅं
रूप सरस पीए जाता हूूॅं ।।
ईश्वर की रचना न्यारी हैै ,
ढॅंको नहीं , यह तो प्यारी है ।
इसपर ही अवलम्बित रहकर ,
मैं जीवन जीए जाता हूॅं।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
ढॅंको नहीं , यह तो प्यारी है ।
इसपर ही अवलम्बित रहकर ,
मैं जीवन जीए जाता हूॅं।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
अंग -अंग से प्रेम टपकता ,
दाता का ही भाव झलकता ।
प्रकट लास्य के गीत रसीले ,
सतत सदा गाए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूूॅंं ।।।
दाता का ही भाव झलकता ।
प्रकट लास्य के गीत रसीले ,
सतत सदा गाए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूूॅंं ।।।
इससे ही जीवन का लय है ,
इससे भिन्न तो मात्र प्रलय है ।
अमृतमय इस रूपराशि को ,
भाॅंति अनेक लिए जाता हूॅं ।
रूपसरस पीए जााता हूॅं ।।
इससे भिन्न तो मात्र प्रलय है ।
अमृतमय इस रूपराशि को ,
भाॅंति अनेक लिए जाता हूॅं ।
रूपसरस पीए जााता हूॅं ।।
पूज्य भाव ,आसूच्य चाव से ,
अपनेे मन के ही चुनाव से ।
मुक्ति मिले मन को तनाव से ,
अनुकृति जाप किए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
अपनेे मन के ही चुनाव से ।
मुक्ति मिले मन को तनाव से ,
अनुकृति जाप किए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
पूर्ण श्लीलता की सतर्कता ,
साधन सुविधा कीअसक्तता ।
में भी किसी तह इस मन को ,
प्रेम से बहलाए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अ्विज्ञात ,
साधन सुविधा कीअसक्तता ।
में भी किसी तह इस मन को ,
प्रेम से बहलाए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अ्विज्ञात ,
मुख्यनियंत्रक , पूूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी
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