रविवार, 31 जनवरी 2016

शब्द - सुमन
ग्यारह अगस्त, 1981
(हिन्दी के प्रथम वैज्ञानिक वैयाकरण : हिन्दी के पाणिनि - आचार्य श्री किशोरी दास वाजपेयी की पुण्य तिथि ) 
जीवन का अन्तिम पड़ाव ,एकाकी वास किशोरी का ।
जीया , जीता जो वही जानें , कितना अवसाद विधुर मन का ।।
बहु बेटा कहते हटा दिया , दादा ने हमको निज गृह से ,
दादा कहते थे छोड़ मुझे ,घर से निकले अपने मन से ।।
कहने का मतलब एकाकी जीवन जीये वे बुढ़ापे में ,
तप किया जहाॅं से गुरुवर ने , रह गए अन्त तक कनखल में।
जीवनभर झेला कष्ट महा ,वृध्दाश्रम में भी वही रहा ,
जब अन्काल था सन्निकट , तब महाकाल क्षयरोग गहा ।।
जीवन के उनके अन्तिम दिन , विद्वानों की थी भीड़ लगी ,
कहते थे अस्फुट शब्दों में , आॅंखें थीं सबकी अश्रुपगी ।।
गाड़ी का इंजन चला गया , डिब्बे भर ही अब शेष रहे ।
जाने को कहो विद्वानों को , सबको ही मेरा प्णाम रहे ।।
बस इतना मुख से निकला था , बैठे पियजन सब फफक पड़े ,
देखे सब वारि विलोचन भरकर, प्राणवायु जब निकल पड़े ।।
सन् उन्नीस सौ एकासी की , ग्यारहवीं तारीख रही ,
स्वतंत्रता का अगस्त माह था , अर्ध्दरात्रि की घड़ी रही ।।
पत्रों ने छापा शोकाकुल , हिन्दी का पाणिनि चला गया ,
नहीं रहे अब प्रथम व्याकरणी , हिन्दी का ललकार गया ।।
निज परिजन के निधन -शोक -सा, साहित्य जगत होकर अधीर ,
सजल नेत्र सब कह इठे , गए सुकवि स्वतंत्रता वीर ।।
बारह अगस्त की दोपहरी , गंगातट पर हरिद्वार में ,
भीगे नेत्रों मुखाग्नि दिए , मधुसूदन कठिन सन्ताप में ।।
मातृभूमि का वह सपूत गंगाजल में समा गया ,
प्रभायुक्त था जीवन जो , गंगा प्रवाह के साथ गया ।।
पंचावयव की बनी देह , पाॅंचों तत्वों में बदल गई ,
क्षीति जल पावक गगन समीरा,जा-मिल प्रकृति में समा गई ।।
(मेरे द्वारा रचित खण्डकाव्य " किशोरी अभिनन्दिनी " से उध्दृत )
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

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