भाग्य का ही खेल सब
जिस पिटारे में भरा था , सर्प पीड़ित भूख से ।
छिद्रकर उसमें घुसा , लालच में चूहा चूक से ।
साॅंप ने चूहे को खाया , छिद्रमार्ग से मुक्ति भी ।
भाग्य का ही खेल सब , हो नाश चाहे वृद्धि भी ।।
पूर्वजन्म के कर्म का , सुख - दु:ख हम हैं भोगते ।
कर्मानुसार ही बुद्धि भी , तब भाग्य को क्यों कोसते ?
विवेक अर्जित ज्ञान से , निज कर्म क्यों न सुधारते ?
अपने सुकर्म विचार ही , दुर्गति से सबको उबारते ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
जिस पिटारे में भरा था , सर्प पीड़ित भूख से ।
छिद्रकर उसमें घुसा , लालच में चूहा चूक से ।
साॅंप ने चूहे को खाया , छिद्रमार्ग से मुक्ति भी ।
भाग्य का ही खेल सब , हो नाश चाहे वृद्धि भी ।।
पूर्वजन्म के कर्म का , सुख - दु:ख हम हैं भोगते ।
कर्मानुसार ही बुद्धि भी , तब भाग्य को क्यों कोसते ?
विवेक अर्जित ज्ञान से , निज कर्म क्यों न सुधारते ?
अपने सुकर्म विचार ही , दुर्गति से सबको उबारते ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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