नजर
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हैं साफ तो बहुत ही , पर गन्दगी ही देखें ।
नफरत भरी नजर ही ,उनकी नजर है सबको ।।
जिसको ही जब भी देखें ,आॅंखें तरेर कर वे ।
चोरों को जैसे कोई ,कोतवाल देखता हो ।।
हर सख्श खौफ खाए , कब उसकी आए बारी ।
कानों की राह नफरत , दिल में जखम बनादे ।।
मन के सुकून की तो , बस एक ही सूरत ।
पत्थर बनालें दिल को , सुख दुख नजर नआए।।
है रंग मंच दुनियाॅं , किरदार सबका अपना ।
गम दूसरों का बाॅंटेें , सुख का रहे न सपना ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक ,पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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हैं साफ तो बहुत ही , पर गन्दगी ही देखें ।
नफरत भरी नजर ही ,उनकी नजर है सबको ।।
जिसको ही जब भी देखें ,आॅंखें तरेर कर वे ।
चोरों को जैसे कोई ,कोतवाल देखता हो ।।
हर सख्श खौफ खाए , कब उसकी आए बारी ।
कानों की राह नफरत , दिल में जखम बनादे ।।
मन के सुकून की तो , बस एक ही सूरत ।
पत्थर बनालें दिल को , सुख दुख नजर नआए।।
है रंग मंच दुनियाॅं , किरदार सबका अपना ।
गम दूसरों का बाॅंटेें , सुख का रहे न सपना ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक ,पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
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