हर कोई रावण नहीं है ,
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रावणी सेना चतुर्दिक ,काम से पहचान आते ।
पारखी की ना जरूरत , बालमन भी जान जाते ।
रावणी दुष्कर्म से , जो ही कभी ना बाज आते ।
लोकहित के शत्रु जो ,सब आसुरी कौशल दिखाते ।
दान श्रम से दूर पर , जो दूसरों की लूट खाते ।
वर्जनाओं को न मानें , क्षमा को कायर बताते ।
धूर्तता छल खूब करके , भोग के साधन जुटाते ।
द्वेष - ईर्ष्या बेईमानी , दंश के हैं गीत गाते ।
परपुरुष परनारि पर ,षडयंत्र से जादू चलाते ।
गलतियों पर शर्म ना ,पर दूसरों के सिर झुकाते ।
रावणी सैनिक सभी ये , मूर्ख हैं चाबुक चलाते ।।
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रावणी सेना चतुर्दिक ,काम से पहचान आते ।
पारखी की ना जरूरत , बालमन भी जान जाते ।
रावणी दुष्कर्म से , जो ही कभी ना बाज आते ।
लोकहित के शत्रु जो ,सब आसुरी कौशल दिखाते ।
दान श्रम से दूर पर , जो दूसरों की लूट खाते ।
वर्जनाओं को न मानें , क्षमा को कायर बताते ।
धूर्तता छल खूब करके , भोग के साधन जुटाते ।
द्वेष - ईर्ष्या बेईमानी , दंश के हैं गीत गाते ।
परपुरुष परनारि पर ,षडयंत्र से जादू चलाते ।
गलतियों पर शर्म ना ,पर दूसरों के सिर झुकाते ।
रावणी सैनिक सभी ये , मूर्ख हैं चाबुक चलाते ।।
इनमें भरें उत्साह जो , वे शक्ति से सबको चराते ।
उच्च पद पर बैठकर , हर कार्य अपना साध जाते ।
एम पी बनें जिनसे एम एल ए शासकों को भी नचाते ।
सबकी जुबां पे नाम हैं ,पर बेबशी सब ही दिखाते ।
बेवक्त तो रावण यही , अधिकांश जन के काम आते ।
अब तो पासा ही उलट , सीधे चुनाव में कूद जाते ।
धन - बाहु के बलवान ये , इनसे नहीं हम पार पाते ।
तृष्णा अनेक लिए सभी , भगवान अब अवतार पाते ।।
उच्च पद पर बैठकर , हर कार्य अपना साध जाते ।
एम पी बनें जिनसे एम एल ए शासकों को भी नचाते ।
सबकी जुबां पे नाम हैं ,पर बेबशी सब ही दिखाते ।
बेवक्त तो रावण यही , अधिकांश जन के काम आते ।
अब तो पासा ही उलट , सीधे चुनाव में कूद जाते ।
धन - बाहु के बलवान ये , इनसे नहीं हम पार पाते ।
तृष्णा अनेक लिए सभी , भगवान अब अवतार पाते ।।
---- सर्वानन्द पाण्डेय , " अविज्ञात
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