रविवार, 31 जनवरी 2016

आज का विचार 

आत्मश्लाघा ने 
इस मुकाम पर
ला खड़ा कर दिया मुझे
कि आत्म निरीक्षण , आत्म परीक्षण ,
आत्म दर्शन और आत्मचिन्तन
की सुध ही नही रही ।।
पद ने ऐसा मद भर दिया मुझमें
कि स्वयं से श्रेष्ठ
मैं किसी को मानता ही नहीं ।।
अब तो मुझे
कुछ करने की जरूरत ही नहीं,
बैठे - बैठाए ही ,
अभूतपूर्व गति से
सबकुछ होने लगा है ,
जिसका श्रेय तो
मुझे मिलना अवश्यम्भावी है ।।
अब तो मैं गुरुओं का भी
गुरू हूॅं ।।
पढ़ता रहा होऊॅं
चाहे जिन - जिन से
उन सभी का मैं
आज परीक्षक हूॅं ।
इसलिए नहीं जरूरत है
अब मुझे
आत्मनिवेदन की ।।
मैं तो पदेन
सर्वज्ञाता हो चुका हूॅं ।।
चाहे मैं मनमर्जी
सैर करूॅं
कहानियाॅं पढ़ूॅं
या कविता गढ़ूॅं ।
पद के प्भाव से लोग मुझे
कला पारखी ,संस्कृतिनिष्ठ,
सभ्यता का उपमान
और साहित्यकार उदीयमान
मानने लगे हैं ,
तभी तो लोग मेरे नाम से
स्वयं को
मर्यादित मानने लगे हैं ।।
यह बात दीगर है
कि शिष्टता , शालीनता ,
संयम और सहिष्णुता से
दूर - दूर तक
मेरा वा्स्ता नहीं रह गया है ।।
आप माने या न माने
परा बुद्धि के अभाव में
नमिता नहीं , पर
अपरा कविता तो
है ही मेरे पास ।।
ईश्वरत्व है मुझमें ,
क्योंकि जो लोग
करते हुए दिखते हैं ,
वास्तव में वे कुछ नहीं करते ।
कर्त्ता तो मैं हूॅं , एकमेव ।
इसलिए एको अहम् द्वितीयो नास्ति ।।
मेरा यह कर्तृत्व भाव
मात्र एक प्रवंचना है ,
यह मुझे संज्ञात है ,
परन्तु मैं इसे आत्मप्रवंचना
कदापि नहीं मानता ,
क्योंकि नारदमोह भी
मेरी एक अनिवार्य कामना है ,
जिसे छोड़ने की कठिन कला
नहीं आती मुझे ।।
आए तो भी
वह वरेण्य नहीं
क्योंकि तब
परिजनों की पूरी शक्ति
और सवयं के कठिन परिश्रम से अर्जित
इस पद - मद का क्या होगा ?
अनाधिकार सुलभ
मेरे तमाम भोगों का क्या होगा ? ?
--- सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

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